बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा नहीं है

“बुद्ध ने एक नए आवरण में वेदांत के अलावा कुछ नहीं सिखाया”

Posted मार्च 26, 2024 02:39:05 दोपहर

उपरोक्त (भावानूदित) वाक्य आधुनिक युग में दो प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों की राय थी: भारत के दिवंगत राष्ट्रपति, एस. राधाकृष्णन और एक बहुत प्रसिद्ध हिंदू नेता, स्वामी विवेकानंद। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इन दो सज्जनों की राय जो किसी भी प्रामाणिक बौद्ध परंपरा से जुड़े नहीं थे, अधिकारिक बौद्ध ग्रंथों और व्याख्यात्मक परंपराओं पर आधारित नहीं थे। लेकिन, यह वास्तव में आश्चर्य की बात है कि उनकी राय वेदांत के प्राचीन आचार्यों के साथ भी मेल नहीं खाती, जैसे कि आदि शंकर, जो बुद्ध को विरोधाभासी शिक्षाओं को पढ़ाने के लिए अविश्वसनीय मानते थे (उनके द्वारा ब्रह्मसूत्र 2.2.32 पर टिप्पणी).

बुद्ध के समय मौजूद उपनिषदों की संख्या पर विद्वानों की दुनिया में अभी भी एकमत नहीं पाया जाता है। यह बहुत संभव है कि कुछ शुरुवाती  उपनिषद उनके समय के पहले से ही  मौजूद थे। हालाँकि बुद्ध ने अपने किसी भी प्रवचन में न तो “उपनिषद” का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है और न ही “सांख्य” का नाम लिया है जिसे षड्दर्शनमध्ये का सबसे पुराना दर्शन  माना जाता है।

भले ही  बुद्ध ने अपने प्रवचनों में ऐसे वैदिक ग्रंथों या विचारधाराओं  का उल्लेख नहीं किया लेकिन उनमें लिखे गए सैद्धान्तिक विषयों को स्पष्ट रुपसे अस्वीकार और उनका खण्डन किया है ।  दूसरी ओर  बौद्ध सूत्रों /सुत्तों में बुद्ध के संग शास्त्रार्थ करने आए कुछ विख्यात ब्राह्मण गुरुओं के बारे में कुछ इस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग पाया जाता है- जैसे  “वे शब्दावली सहित तीन वेद , निघण्टु, कल्प, स्वरविज्ञान, व्युत्पत्ति विज्ञान (शब्दों के उद्गम का शास्त्र)  तथा पांचवां इतिहास में पारंगत….भाषाविज्ञान तथा व्याकरण में दक्ष, ब्रह्माण्ड विज्ञान और  महामानव के लक्षणों में निपुण थे ।  (तिण्णं वेदानं पारगू सनिघण्डुकेटुभानं साक्खरप्पभेदानं इतिहासपञ्‍चमानं पदको वेय्याकरणो लोकायतमहापुरिसलक्खण)” इस सन्दर्भ से हम यह निश्चित रूप से समझ सकते हैं कि बुद्ध के समय में या बुद्ध ने अपने जीवनकाल को व्यतीत किये हुए क्षेत्र में केवल तीन वेद संभवतः  ऋग्, साम् और  अथर्व अस्तित्व में थे। बौद्ध सूत्रों /सुत्तों में  उल्लेखित वैदिक ब्राह्मणों के सँग हुए ऐसे शास्त्रार्थों/ संवादौं से हम  निम्नानुसार तीन मुख्य बातें समझ सकते हैं : 

१) बुद्ध के संग जो संवाद या शास्त्रार्थ करने आते थे, वे अक्सर बुद्ध द्वारा वैदिक अभ्यास तथा सिद्धांतों का यथारुप उद्धृत सुनकर हैरान हो जाते थे।  इसके अतिरिक्त बुद्ध उनके दार्शनिक दृष्टिकोण तथा अभ्यासों का खंडन कर उनमें मौजूद निहित त्रुटियों को दिखाकर अंत में उन्हें अपनी  प्रणाली को स्वीकार करने के लिए मनवा लेते थे जिसके लिए वे बुद्ध की शरण लेते थे । बौद्ध संघ के भीतर ऐसे हजारों वैदिक ब्राह्मण थे जो उनके शिष्य बन गए थे। यदि बुद्ध ने उन्हें कुछ ऐसी शिक्षा दी होती जिसे  वे पहले से ही जानते या उनका पालन करते थे तो वे अपनी प्रणाली को छोड़कर बुद्ध की प्रणाली में कभी भी कूद न पड़ते । 

२) कईं बौद्ध सूत्रों /सूत्तों में बुद्ध या उनके बौद्ध शिष्यों के प्रति वैदिक ब्राह्मणों की शत्रुता और अपमान ​​का उल्लेख है। वे बुद्ध को अपमानजनक शब्दों जैसे “मथमुण्डा,” “छोटा,” ​​“नीच,” “अछूत” इत्यादि से बुलाते थे । इसके अतिरिक्त बुद्ध की शिक्षा को स्वीकार कर बुद्ध की शरण में आए ब्राह्मण अपने विरुद्ध अन्य ब्राह्मणों की तिरस्कृत दृष्टी प्रति अपनी  उदासी व्यक्त करते थे।  यदि बुद्ध ने वेद या उपनिषद में लिखी बातों को पढ़ाया होता तो ऐसी अवस्था न आती। 

३) बुद्ध की शिक्षा उपनिषद्  ग्रंथों के सैद्धान्तिक अवधारणाओं के ठीक विपरीत है । ब्रह्मजाल सुत्त, तिलख्खण सुत्त, अनत्त लख्खण सुत्त आदि जैसे अनेकों सूत्रों /सुत्तों में  बुद्ध ने उपनिषदों के अनुसार कूटस्थ और नित्य बताई गई  ‘आत्मा’ या  ‘ब्रह्म’ जैसी  अवधारणा को  सर्वथा अस्वीकार किया है जिसे इन उपनिषदों ने अस्तित्व का परमसत्य माना है।  ऐसा प्रतीत होता है कि पञ्चत्रयसूत्र (पञ्चत्तयसुत्त) में  बुद्ध ने  “सांख्य” और  “न्याय-वैशेषिक” दर्शन का संकेत किया है । बुद्ध ने इस सुत्त में कूटस्थ और  नित्य कही जाने वाली सत्ता को ‘संज्ञीआत्मा’ और  ‘असंज्ञीआत्मा’  दो प्रकार में बांटते हुए दोनों की अवधारणाओं को सर्वथा अस्वीकार किया है  । यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सांख्य का “पुरुष” सचेत है लेकिन न्याय में “आत्मा” जड है।  अनित्य और अनात्मा के लक्षण से  युक्त पञ्चस्कन्ध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान) के अलावा ब्रह्माण्ड में उससे परे और उससे ऊपर किसी भी सत्ता को बुद्ध ने स्वीकार नहीं किया है।  इसके अतिरिक्त  बुद्धोपदेशित प्रतीत्यसमुत्पाद के  सिद्धान्त से इस बात की भी पुष्टि होती है कि ऐसी कूटस्थ और नित्य सत्ता का अस्तित्व असंभव है। 

इसलिए भारत के दिवंगत राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन और स्वामी विवेकानंद का यह  कहना कि बुद्ध ने अपने जीवनकाल में वेदांत के अलावा कुछ नहीं सिखाया, यह एक गलत धारणा और गलत व्याख्या है।

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