बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा नहीं है

नेपाली या भारतीय ऐसा क्यों सोचते हैं कि बुद्धधर्म हिन्दुधर्म की एक शाखा है?

Posted By Admin, मार्च 26, 2024 02:50:46 दोपहर

यह एक बहुत ही जटिल मुद्दा है जिसके लिए इन दो धर्मों के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप में उनके ऐतिहासिक विकासक्रम को समझने की  गहन  आवश्यकता है।  भारतीय उपमहाद्वीप में इस गलतफहमी ने अपना आकार क्यों लिया, इसे समझने के लिए मुख्य रूप से तीन पहलू हैं:

ऐतिहासिक कारण

  1. वैदिक हिन्दुधर्मानुयायी का बुद्ध और बुद्धधर्म के प्रति वैमनस्यता (शत्रुता): बौद्ध और वैदिक-हिन्दु साहित्य  दोनों ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रति वैदिक हिंदू धर्म के अनुयायियों की शत्रुता के साक्षी हैं।  वैदिक हिन्दुधर्मानुयायों ने प्राचीन भारतवर्ष में जंगल की आग की तरह फैलने लगे इस नए आंदोलन को दबाने की कोशिश की क्योंकि बुद्ध ने वैदिक हिंदू परंपरा और उसके सिद्धांतों का खंडन किया और जातिगत वर्णाश्रम धर्म को पूर्णतया अस्वीकार (खारिज) कर दिया जिसके कारण  वैदिक हिंदू धर्म की लोकप्रियता पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
  2. बौद्ध धर्म पर प्रहार उपरोक्त कारणवश, प्राचीन भारतवर्ष में वैदिक हिंदू गुरु और राजाओं द्वारा बौद्ध धर्म को बारम्बार सताया गया था। बौद्ध उनके उत्पीड़न और दमन के शिकार हुए थे ।
  3. दुष्प्रचार :  बौद्ध धर्म को कमजोर करने के लिए शुरू किए गए उत्पीड़न और दमन के अलावा बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में गलत सूचना फैलाना वैदिक हिंदू अनुयायियों द्वारा बौद्ध धर्म की लोकप्रियता को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक और तरीका था। उदाहरण के लिए २-३ वीं शताब्दी के दौरान प्राचीन भारतवर्ष में “बुद्ध को विष्णु के अवतार” के रूप में शामिल करना एक कुटिल चाल थी जिसने  बौद्ध धर्म को कम करने और अंततः  बौद्ध धर्म को वैदिक हिन्दु आवरण के भीतर सहयोजित करने में मदद की ।
  4. बौद्ध धर्म का पतन: वैदिक हिंदू उत्पीड़न और मुस्लिम आक्रमण के कारण लगभग ११-१२वीं शताब्दी में नालंदा / विक्रमशिला आदि जैसे महान बौद्ध विश्वविद्यालयों का विनाश हुआ।  जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म धीरे-धीरे क्षीण होना शुरू हो गया।

दार्शनिक कारण

  1. बुद्ध के धर्म को समझना मुश्किल है: बुद्धधर्म के सिद्धांत  सूक्ष्म और गहरे हैं खासकर किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो एक कट्टर ईश्वरवादी पृष्ठभूमि से आता है; या आत्मा/ब्रह्म जैसे शाश्वतवादी चिंतन को ग्रहण किये हुए व्यक्तियों के लिए इसे तुरंत स्वीकार करना बहुत मुश्किल है। वैदिक हिंदू पण्डित, स्वामी या बाबा जिन्होंने बौद्ध धर्म को गलत समझा, उन्होंने मूल बौद्ध सिद्धान्त अर्थात् सत्य के स्वरुपके बारे मे बौद्ध अवधारणा, विशेष रूप से “प्रतीत्यसमुत्पाद” के सिद्धान्तको ठीक से नहीं समझा ।
  2. बुद्ध धर्म की गलत व्याख्या: उपरोक्त कारणवश बहुत से वैदिक हिंदू विद्वानों, पंडितों, बाबाओं  आदि ने  बौद्ध धर्म को गलत समझा और अपने स्वयं की कल्पना पर आधारित होकर इसकी अपव्याख्या की। इसलिए, हिंदू/वैदिक अनुयायियों के बीच बौद्ध धर्म के एक विकृत रूप का ही प्रचार हुआ । चूंकि १२वीं शताब्दी से भारत में बौद्ध धर्म लुप्त हो गया था इसलिए ऐसी गलत व्याख्याओं को ठीक करने वाला कोई बौद्ध नहीं था।
  3. वैदिक हिंदू धर्म समावेश और उदारवाद में विश्वास करता है: यह कुछ वैदिक हिदायतों  पर आधारित हैं  जैसे कि “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” (सत्य केवल एक ही है लेकिन बुद्धिमान उन्हें विभिन्न तरीकों से व्यक्त करते हैं)। अपनी परंपरा के प्रचुर अंतर्विरोधों और विसंगतियों के साथ समझौता करने के बाद वैदिक हिंदुओं ने बुद्ध धर्म प्रति वही दृष्टिकोण रखा और बुद्धधर्म को भी वैदिक-हिन्दुधर्म के ही एक विद्रोही धार की शाखा के रूप में लेने लगे। इस तरह के गलत दार्शनिक आधार ने बौद्ध धर्म को समझने के लिए एक बाधा उत्पन्न की। विशेष रूपसे जब बौद्ध धर्म भारत से गायब हो गया तब वैदिक हिंदू धर्म ने बौद्ध धर्म को अपनी प्रणाली में शामिल करने के कईं प्रयास किए। क्योंकि अपने मूल सिद्धान्तसे विपरीत धर्मों को भी अपने में समाहित करना भी वैदिक हिन्दुधर्म में सकारात्मक माना जाता है। 
  4. वैदिक हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों ने संस्कृत जैसी समान भाषासमूहों का उपयोग किया जिसके कारण बौद्ध धर्म को गलत समझने के लिए पर्याप्त भ्रम पैदा हुआ। (हालांकि बौद्ध ग्रंथों में प्रयोग की जाने वाली संस्कृत-वैदिक संस्कृत की श्रेणी में नहीं आती है)। इसलिए, वैदिक विद्वानों/टिकाकारों/व्याख्याकारों ने “बौद्ध संस्कृत” का गलत अर्थ निकालना शुरू कर दिया और बौद्ध दृष्टिकोण, व्याकरण के उपयोग को समझे बिना, अपनी व्याख्यात्मक प्रणालियों के आधार पर गलत विचारों को पेश किया। वैदिक हिंदू यह समझने में असफल रहे कि बौद्धसंस्कृत संस्कृत भाषा की एक अलग श्रेणी है। दुर्भाग्यवश, वैदिक हिंदुओं ने इसका अर्थ निकालने के लिए अपनी व्याख्यात्मक प्रणालियों का इस्तेमाल किया जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध शिक्षाओं का विरूपण हुआ।

सांस्कृतिक/सामाजिक/राजनैतिक कारण

  1. एक ही स्थान और समय में होने के कारण, वैदिक – हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों में “सांस्कृतिक”  आदानप्रदान  होने लगा। विशेष रूप से वैदिक हिन्दुधर्म ने बौद्ध विचारौं को अपने में समाहित किया जिन विचारों का अर्थ भारतवर्ष से बौद्ध धर्म के गायब होने के बाद समझ से बाहर हो चुका थे। इसलिए इन दोनों धर्मों के मूल सैद्धान्तिक भिन्नता सांस्कृतिक समानताओं के आवरण में छुप गया ।
  2. मुसलमानों के  आक्रमण के बाद उनके धर्म के साथ साथ भारतवर्षमें  रहे अन्य सभी धर्मों के लिए  एक “सांझी आधार” खोजने की  आवश्यकता पढ़ी । तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति ने “सभी  धर्म समान है” या “वे सभी हमको मानव बनने के लिए प्रेरित करते हैं” जैसी  सैद्धान्तिक अवधारणाओं को आगे बढ़ाया गया । इस प्रकार के सामाजिक अभियान ने जनमानस में जड़ पकड़ी । साधुसंतों ने ऐसे   विषय से सम्बन्धित स्तोत्र, गीत तथा कवितााओं की  रचना की जिसने  जनमानसका ध्यानाकर्षित किया । इसके  फलस्वरूप नेपाल और भारतमें समावेशी और भक्ति परम्परा एक प्रमुख आध्यात्मिक संस्कृतिके  रुपमें पनपने लगी  । फलस्वरुप मूल सैद्धान्तिक भिन्नता ओझल होने लगीं ।
  3. मुसलमानी आक्रमण और उपनिवेशीकरण के कारण वैदिक-हिन्दुधर्म निस्तेज होता गया; संस्कृत में लिखा आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन करने वाली संस्कृति भी क्षय होता चला गया । जिसके कारण वैदिक-हिन्दुओं ने भारतीय धर्मों के विषय में गलत जानकारी रखने लगे जो आज तक भी जारी है ।
  4. उपनिवेशवाद के बाद, राष्ट्रवादी की भावना से ओतप्रोत होकर वैदिक हिंदुओं ने अपनी खोई हुई महिमा को पुनः प्राप्त करने के लिए अपने भौगोलिक क्षेत्र के भीतर रहे सभी आस्थाओं और मतों को एकजुट करने और एक महान “भारत” का दावी करने का सपना देखना शुरू कर दिय। इस तरह के राजनीतिक और सामाजिक अवस्था के आधार पर बुद्धधर्म की विशिष्ट दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा को नकारते हुए विकृतियों और गलत व्याख्याओं को आगे बढ़ाया गया । हाल ही में हिंदुत्व आंदोलन ने जनमानस में इस विश्वास को सुदृढ़ करने में मदद कर रहा है कि “बौद्ध धर्म एक अलग आध्यात्मिक परंपरा नहीं है”।
  5. चूंकि डॉ. अम्बेडकर ने भारत में बहिष्कृत और दलित जातियों से संबंधित सामाजिक मुद्दों से निपटने के लिए बौद्ध धर्मको नियोजित किया इसलिए अभिजात्य ब्राह्मणों/राजनीतिक नेताओं/विद्वानों ने बौद्ध धर्म को अपने दायरे में शामिल करना और भी महत्वपूर्ण पाया।

इन कारणों वजह से आज नेपाल और भारत में हिन्दू समाज यह नहीं समझ नहीं पा रहे हैं कि बौद्ध धर्म एक अलग आध्यात्मिक परंपरा है जो वैदिक धर्म के दायरे से बाहर है।

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